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मैं क्यों लिखता हूँ?

1. लेखन का उद्देश्य और आंतरिक विवशता

  • स्वयं को जानने के लिए: लेखक का मानना है कि वे इसलिए लिखते हैं ताकि वे जान सकें कि वे क्यों लिखते हैं। बिना लिखे इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता।
  • आंतरिक मुक्ति: लेखन केवल बाहरी कार्य नहीं है, बल्कि यह लेखक की एक आंतरिक विवशता है। लिखकर ही वह इस दबाव को पहचानता है और उससे मुक्त हो पाता है।
  • बाहरी दबावों की भूमिका: यद्यपि प्रसिद्धि, पैसा या संपादकों का आग्रह जैसे बाहरी दबाव भी होते हैं, लेकिन सच्चा कृतिकार (रचनाकार) अपनी भीतरी प्रेरणा (उन्मेष) से ही लिखता है। बाहरी दबाव केवल एक सहायक यंत्र की तरह काम करते हैं (जैसे सुबह उठने के लिए अलार्म घड़ी)।

2. 'अनुभव' और 'अनुभूति' में अंतर

  • अनुभव (Experience): यह वह है जो हमारे सामने घटित होता है। यह आँखों देखा सत्य हो सकता है, लेकिन यह केवल बाहरी समझ तक सीमित रह सकता है।
  • अनुभूति (Sensibility/Realization): यह संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को अपने भीतर आत्मसात कर लेना है जो वास्तव में हमारे साथ घटित नहीं हुआ।
  • सृजन का मूल: लेखक के अनुसार, केवल अनुभव से कृति (रचना) पैदा नहीं होती, बल्कि 'अनुभूति' ही वह शक्ति है जो लेखक को लिखने के लिए विवश करती है।

3. विज्ञान का ज्ञान और हिरोशिमा

  • लेखक विज्ञान के विद्यार्थी थे और उन्हें अणु (Atom) और रेडियोधर्मी तत्वों के सिद्धांत और प्रभावों का पूरा किताबी ज्ञान था।
  • जब हिरोशिमा पर बम गिरा, तो उन्होंने उसके समाचार पढ़े। उनकी बुद्धि ने इस विनाश को समझा और इसके विरुद्ध क्रोध भी आया, लेकिन उस समय उन्हें वह गहरी 'अनुभूति' नहीं हुई जो रचना के लिए आवश्यक थी।
  • युद्धकाल में उन्होंने भारत की पूर्वी सीमा पर सैनिकों द्वारा बम फेंककर मछलियाँ मारते देखा था, जिससे उन्हें जीव-नाश की पीड़ा का थोड़ा आभास था।

4. पत्थर पर मानव की छाया

  • जापान यात्रा के दौरान लेखक हिरोशिमा गए और अस्पतालों में पीड़ितों को देखा। यह 'प्रत्यक्ष अनुभव' था, पर अभी भी वह भावनात्मक गहराई (अनुभूति) नदारद थी।
  • निर्णायक क्षण: एक दिन सड़क पर घूमते हुए उन्होंने एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी, उजली छाया देखी।
  • त्रासदी का साक्षात्कार: लेखक ने समझा कि विस्फोट के समय कोई व्यक्ति वहाँ खड़ा रहा होगा। परमाणु विस्फोट की गर्मी ने पत्थर को झुलसा दिया, लेकिन उस व्यक्ति के शरीर ने किरणों को रोक लिया, जिससे पीछे छाया बन गई। वह व्यक्ति उसी क्षण भाप (steam) बनकर उड़ गया होगा।

5. विस्फोट की अनुभूति और कविता

  • उस छाया को देखकर लेखक को एक जोरदार थप्पड़ जैसा महसूस हुआ। इतिहास का वह भयानक क्षण उनके भीतर जीवित हो उठा जैसे वह विस्फोट उसी क्षण उनके अंदर हुआ हो।
  • वे स्वयं उस पीड़ा के 'भोक्ता' बन गए। यह अब केवल आँखों देखा दृश्य नहीं था, बल्कि एक ज्वलंत 'अनुभूति' थी।
  • इसी अनुभूति ने उन्हें लिखने पर विवश किया। उन्होंने तत्काल वहां नहीं लिखा, बल्कि भारत लौटकर रेलगाड़ी में बैठे-बैठे 'हिरोशिमा' कविता लिखी।
  • लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि कविता अच्छी है या बुरी, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि वह सच्ची अनुभूति से पैदा हुई है।

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