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माता का अँचल
परिचय: यह पाठ शिवपूजन सहाय द्वारा लिखित है। इसमें लेखक ने अपने बचपन की यादों और माता-पिता के साथ अपने स्नेहपूर्ण संबंधों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। कहानी का मुख्य पात्र 'भोलानाथ' (लेखक का बचपन का नाम) है।
पिता के साथ बचपन और दिनचर्या
- भोलानाथ का अपने पिता के साथ गहरा जुड़ाव था। वह रात में पिता के साथ ही सोते थे और सुबह उन्हीं के साथ उठते थे।
- पिता जी उन्हें नहला-धुलाकर पूजा में अपने साथ बैठा लेते थे और उनके माथे पर भभूत का तिलक लगाकर उन्हें 'बम-भोला' बना देते थे।
- पिता जी 'रामायण' का पाठ करते समय भोलानाथ को अपने पास बैठाकर आइने में उनका चेहरा निहारते और खुश होते थे।
- पूजा के बाद पिता जी 'रामनाम बही' पर हजार बार राम-नाम लिखते और आटे की गोलियों में कागज की पर्चियां लपेटकर गंगा जी में मछलियों को खिलाने ले जाते थे। उस समय भोलानाथ उनके कंधे पर बैठे रहते थे।
- लौटते समय पिता जी उन्हें पेड़ों की डालों पर झुलाते थे और घर पर उनके साथ कुश्ती भी लड़ते थे, जिसमें वे जानबूझकर हार जाते ताकि भोलानाथ खुश हो सकें।
माँ का ममतामयी भोजन और श्रृंगार
- पिता जी द्वारा खाना खिलाने के बाद भी माँ को तसल्ली नहीं होती थी। उनका मानना था कि "जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर।"
- माँ तोता, मैना, कबूतर, हंस आदि पक्षियों के बनावटी नाम लेकर भोलानाथ को यह कहकर खाना खिलातीं कि "जल्दी खा लो, नहीं तो उड़ जाएंगे।"
- खाना खिलाने के बाद माँ जबरदस्ती पकड़कर भोलानाथ के सिर में कड़वा तेल लगातीं, बाल गूंथकर चोटी बनातीं और फूलदार कुर्ता-टोपी पहनाकर उन्हें 'कन्हैया' बना देती थीं।
मित्र मंडली और बचपन के खेल
- बाहर निकलते ही भोलानाथ को उनकी मित्र मंडली मिल जाती थी, जिसे देखते ही वह रोना-सिसकना भूल जाते थे।
- बच्चे तरह-तरह के नाटक और खेल खेलते थे, जैसे:
- मिठाई की दुकान: ढेले के लड्डू और पत्तों की पूरी-कचौरी।
- घरौंदा बनाना: धूल की मेड़ और तिनकों का छप्पर।
- खेती करना: चबूतरे को खेत और कंकड़ को बीज बनाना।
- बरात निकालना: कनस्तर का तंबूरा बजाना और चूहेदानी की पालकी बनाना।
- पिता जी भी कभी-कभी इन खेलों में शामिल हो जाते, जिसे देखकर बच्चे हंसकर भाग जाते थे।
शरारत और मुसीबत
- एक बार आंधी आने पर बच्चे आम के बाग में आम चुनने गए।
- वहां से लौटते समय बच्चों ने बूढ़े मूसन तिवारी को चिढ़ाया, "बुढ़वा बेईमान मांगे करैला का चोखा।"
- मूसन तिवारी ने पाठशाला में शिकायत कर दी, जिसके बाद गुरुजी ने बच्चों की खूब खबर ली। पिता जी ने पाठशाला जाकर गुरुजी से विनती की और भोलानाथ को घर ले आए।
साँप का निकलना और माँ का अँचल
- एक दिन बच्चे टीले पर जाकर चूहों के बिल में पानी डालने लगे। बच्चों ने सोचा गणेश जी के चूहे बाहर आएंगे, लेकिन बिल से शिवजी का साँप निकल आया।
- साँप को देखते ही बच्चे बदहवास होकर भागे। कोई औंधे मुंह गिरा, किसी का सिर फूटा और पैरों के तलवे कांटों से छलनी हो गए।
- भोलानाथ लहूलुहान हालत में दौड़ते हुए घर पहुंचे। उस समय पिता जी ओसारे में हुक्का पी रहे थे, लेकिन भोलानाथ उनके पास नहीं रुके।
- वह सीधे घर के अंदर जाकर माँ की गोद में छिप गए और उनके अँचल में शरण ली।
- बच्चे की यह हालत देखकर माँ जोर-जोर से रोने लगीं। उन्होंने जल्दी से हल्दी पीसकर भोलानाथ के घावों पर लगाई।
- निष्कर्ष: अंत में, पिता के बुलाने और गोद में लेने की कोशिश करने के बावजूद, भोलानाथ ने माँ का अँचल नहीं छोड़ा। यह घटना दर्शाती है कि विपत्ति के समय बच्चा पिता के स्नेह की तुलना में माँ की गोद (अँचल) में ही सबसे अधिक सुरक्षित और शांत महसूस करता है।
~ अध्याय सारांश समाप्त ~
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