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टोपी शुक्ला

मुख्य पात्र: टोपी (बलभद्र नारायण शुक्ला) और इफ़्फ़न (सैय्यद ज़रगाम मुर्तज़ा)

यह कहानी दो दोस्तों, टोपी और इफ़्फ़न के अटूट रिश्ते और बचपन के भोलेपन को दर्शाती है, जो धर्म और जाति की दीवारों से ऊपर है।

1. टोपी और इफ़्फ़न की दोस्ती

  • टोपी शुक्ला और इफ़्फ़न दो अलग-अलग धर्मों और व्यक्तित्व के बच्चे थे, लेकिन एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।
  • कहानीकार का मानना है कि टोपी की कहानी इफ़्फ़न के बिना पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि इफ़्फ़न टोपी की कहानी का एक अटूट हिस्सा है।
  • इफ़्फ़न, टोपी का पहला दोस्त था।

2. इफ़्फ़न का परिवार और उसकी दादी

  • इफ़्फ़न के पूर्वज: इफ़्फ़न के दादा और परदादा प्रसिद्ध मौलवी थे। वे काफ़िरों (गैर-मुस्लिम) के देश में पैदा हुए और मरे, लेकिन उनकी वसीयत के अनुसार उनकी लाशें कर्बला ले जाई गईं।
  • इफ़्फ़न के पिता: इफ़्फ़न के पिता (सैय्यद मुर्तज़ा हुसैन) पहले ऐसे व्यक्ति थे जो हिंदुस्तान में पैदा हुए और यहीं दफ़न हुए।
  • इफ़्फ़न की दादी:
    • इफ़्फ़न की दादी किसी मौलवी की बेटी नहीं, बल्कि एक ज़मींदार की बेटी थीं और 'पूरब' की रहने वाली थीं।
    • उन्हें अपने मायके की भाषा (पूर्वी बोली), घी और दही बहुत पसंद था। लखनऊ आकर भी उन्होंने अपनी भाषा नहीं छोड़ी।
    • ससुराल में मौलवी के घर होने के कारण वे अपने बेटे की शादी में गाना-बजाना नहीं कर पाईं, जिसका उन्हें मलाल था। लेकिन इफ़्फ़न के जन्म (छठी) पर उन्होंने जी भरकर जश्न मनाया।

3. टोपी का इफ़्फ़न की दादी से लगाव

  • टोपी को अपनी दादी (सुभद्रा देवी) पसंद नहीं थी क्योंकि वे सख्त थीं, लेकिन उसे इफ़्फ़न की दादी से बहुत प्यार था।
  • इफ़्फ़न की दादी उसे अपनी माँ जैसी लगती थीं। उनकी पूर्वी बोली टोपी के दिल को छू जाती थी।
  • टोपी अक्सर इफ़्फ़न के घर जाकर उसकी दादी के पास बैठता और उनसे कहानियाँ सुनता था। दादी उसे बहराम डाकू, अनार परी और बारह बुर्ज की कहानियाँ सुनाती थीं।
  • टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात भी कही थी, क्योंकि उसकी अपनी दादी हमेशा उसे डांटती रहती थीं।

4. 'अम्मी' शब्द और घर में बवाल

  • इफ़्फ़न के साथ रहकर टोपी ने 'अम्मी' शब्द सीख लिया था।
  • एक दिन खाना खाते समय, जब मेज़ पर पूरा परिवार बैठा था, टोपी ने अपनी माँ (रामदुलारी) से कहा, "अम्मी, ज़रा बैंगन का भुरता देना।"
  • हिंदू ब्राह्मण परिवार में 'अम्मी' शब्द सुनकर कोहराम मच गया।
  • दादी सुभद्रा देवी ने आसमान सिर पर उठा लिया और माँ रामदुलारी ने टोपी की जमकर पिटाई की।
  • फिर भी टोपी ने यह नहीं बताया कि वह इफ़्फ़न के घर जाता है, हालाँकि मुन्नी बाबू (टोपी के बड़े भाई) ने चुगली कर दी थी कि उन्होंने टोपी को इफ़्फ़न के साथ कबाब खाते देखा था (जो कि झूठ था)।

5. दादी की मृत्यु और इफ़्फ़न का जाना

  • जब इफ़्फ़न की दादी की मृत्यु हुई, तो टोपी को गहरा धक्का लगा। उसने कहा था, "तेरी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती तो ठीक भया होता।"
  • इफ़्फ़न की दादी के मरने के बाद इफ़्फ़न का घर टोपी को खाली-खाली लगने लगा।
  • 10 अक्टूबर 1945: यह तारीख टोपी के जीवन में महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसी दिन इफ़्फ़न के पिता का तबादला मुरादाबाद हो गया और इफ़्फ़न चला गया।
  • टोपी ने कसम खाई कि अब वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगा जिसके पिता की नौकरी बदलने वाली (ट्रांसफरेबल) हो।

6. अकेलेपन का संघर्ष और नए कलेक्टर के बच्चे

  • इफ़्फ़न के जाने के बाद, उस बंगले में नए कलेक्टर ठाकुर हरिनांम सिंह आए, जिनके तीन लड़के थे - डब्बू, बीलू और गुड्डू।
  • ये लड़के अंग्रेज़ी बोलते थे और बहुत घमंडी थे। टोपी ने उनसे दोस्ती करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसका मज़ाक उड़ाया।
  • एक दिन उन्होंने टोपी के पीछे कुत्ता (अल्सेशियन) छोड़ दिया, जिसके काटने से टोपी को पेट में सात सुइयां लगवानी पड़ीं। इसके बाद टोपी ने उस बंगले की तरफ जाना छोड़ दिया।
  • घर में टोपी का सहारा केवल बूढ़ी नौकरानी 'सीता' थी, जो उसका दुख समझती थी।

7. पढ़ाई में विफलता और पारिवारिक उपेक्षा

  • टोपी पढ़ाई में तेज़ था, लेकिन घर के माहौल के कारण वह दो साल लगातार फेल हुआ।
  • नौवीं कक्षा में फेल होने के कारण:
    • पहले साल: घर के कामों (मुन्नी बाबू के काम और माँ की फरमाइशें) के कारण वह पढ़ नहीं पाया। साथ ही, उसके छोटे भाई भैरव ने उसकी कॉपियों के हवाई जहाज बनाकर उड़ा दिए थे।
    • दूसरे साल: उसे टाइफाइड हो गया था।
  • तीसरे साल वह थर्ड डिवीज़न में पास हुआ।
  • जब वह फेल हुआ, तो घर वाले उसे ताने देते थे। मुन्नी बाबू इंटर में फर्स्ट आए और भैरव छठे दर्जे में पास हुआ, जिससे टोपी की स्थिति और खराब हो गई।
  • स्कूल में भी उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी क्योंकि उसके दोस्त (जैसे अब्दुल वहीद) आगे की कक्षाओं में चले गए थे और उसे अपने से छोटे बच्चों के साथ बैठना पड़ता था। मास्टर्स भी उस पर व्यंग्य करते थे।
  • अंततः, सन 1952 में जब उसके पिता चुनाव में खड़े हुए और हार गए, तब घर में थोड़ी शांति हुई और टोपी ने अपनी पढ़ाई पूरी की।

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