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सपनों के-से दिन

1. बचपन के खेल और चोटें

  • लेखक और उनके साथी बचपन में फटे-पुराने कपड़े पहनकर, नंगे पांव खेला करते थे। खेल-खेल में वे अक्सर गिर जाते, चोटिल हो जाते और उनके पैरों में छाले पड़ जाते थे।
  • धूल और मिट्टी से सने होने और चोट लगने पर भी जब वे घर पहुँचते, तो माँ-बहनों से उन्हें सहानुभूति की जगह मार पड़ती थी। फिर भी, वे अगले दिन दोबारा खेलने चले आते थे।
  • लेखक ने बाद में समझा कि बच्चों का खेलना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जिसे मनोविज्ञान भी सही मानता है।

2. पढ़ाई के प्रति अरुचि और पारिवारिक माहौल

  • लेखक के अधिकतर साथी गरीब परिवारों से थे जो पढ़ाई में रुचि नहीं रखते थे। माता-पिता भी पढ़ाई को जरूरी नहीं समझते थे और चाहते थे कि बच्चे मुनीम का काम सीखकर दुकानों का हिसाब-किताब संभालें।
  • नई कक्षा में जाने पर बच्चों को पुरानी किताबों की विशेष गंध से उदासी और डर महसूस होता था क्योंकि यह उन्हें आने वाले कठिन साल और मास्टरों की मार की याद दिलाती थी।
  • लेखक के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि हेडमास्टर साहब एक अमीर बच्चे की पुरानी किताबें लेखक को लाकर देते थे, जिससे उनकी पढ़ाई जारी रह सकी।

3. छुट्टियों का आनंद और होमवर्क का डर

  • स्कूल में शुरू के साल में डेढ़-दो महीने की छुट्टियाँ होती थीं। अधिकतर बच्चे ननिहाल चले जाते, जहाँ नानी उन्हें खूब दूध, दही और मक्खन खिलाती थीं।
  • जो बच्चे ननिहाल नहीं जाते, वे गाँव के तालाब में तैरते और मस्ती करते।
  • छुट्टियाँ खत्म होने पर स्कूल का डर सताने लगता। मास्टरों द्वारा दिया गया ढेर सारा होमवर्क (जैसे 200 सवाल) पूरा न होने पर बच्चे हिसाब लगाते कि होमवर्क करने से बेहतर है मास्टरों की पिटाई खा लेना। वे पिटाई को "सस्ता सौदा" समझते थे।
  • लेखक के ग्रुप का लीडर 'ओमा' था, जिसका सिर बड़ा था और वह लड़ाई में अपने सिर से टक्कर मारता था, जिसे बच्चे 'रेल-बंबा' कहते थे।

4. स्कूल का वातावरण और पी.टी. सर

  • स्कूल छोटा था और कमरे अंग्रेजी के 'H' अक्षर के आकार में बने थे।
  • हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा: वे बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे। वे कभी बच्चों को नहीं पीटते थे, केवल गुस्से में गाल पर हल्की चपत लगाते थे।
  • पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद: वे बहुत सख्त थे। उनका कद छोटा, शरीर गठीला और आँखें बाज़ जैसी थीं। वे खाकी वर्दी और भारी बूट पहनते थे। बच्चे उनसे बहुत डरते थे।
  • स्काउटिंग की परेड के दौरान जब पी.टी. सर "शाबाश" कहते थे, तो लेखकों को लगता था कि उन्होंने फौज का कोई बड़ा तमगा जीत लिया है। रंगीन झंडियों और खाकी वर्दी में उन्हें खुद के फौजी होने का अहसास होता था।

5. फारसी की कक्षा और पी.टी. सर का निलंबन

  • चौथी कक्षा में पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद फारसी पढ़ाने आए। उन्होंने बच्चों को शब्द-रूप याद करने को कहा, जो बहुत कठिन था।
  • अगले दिन जब कोई बच्चा पाठ नहीं सुना पाया, तो मास्टर जी ने क्रूरतापूर्वक सभी को 'मुर्गा' बनने (कान पकड़कर पीठ ऊंची करने) की सजा दी। लेखक जैसे कमजोर बच्चे दर्द के मारे गिर पड़े।
  • हेडमास्टर शर्मा जी ने जब यह दृश्य देखा, तो वे सहन नहीं कर पाए। उन्होंने पी.टी. मास्टर को बच्चों के साथ ऐसी बर्बरता करने के लिए डांटा और उन्हें तुरंत मुअत्तल (Suspend) कर दिया।

6. तोतों के प्रति प्रेम और निष्कर्ष

  • निलंबन के बाद पी.टी. मास्टर अपने चौबारे (किराए के कमरे) में आराम से रहने लगे। उन्हें अपनी नौकरी जाने की चिंता नहीं थी।
  • लेखक और उनके साथियों को यह देखकर आश्चर्य होता था कि जो कठोर मास्टर बच्चों की खाल उधेड़ने को तैयार रहते थे, वे अपने पिंजरे में बंद तोतों से मीठी-मीठी बातें करते थे और उन्हें भीगे हुए बादाम छीलकर खिलाते थे।
  • यह विरोधाभास बच्चों के लिए एक चमत्कार जैसा था कि इतना क्रूर इंसान पक्षियों के प्रति इतना कोमल कैसे हो सकता है।
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